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मंगल गीत मालिका (मेवाड़ में गाये जाने वाले मंगल गीत)

Garland Of Auspicious Songs (Auspicious Songs Sung In Mewar) (Hindi)

300.00

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ISBN 9789367093269
Name of Authors Akshaya Kumar Derashri , Manohar Singh Rathor
Name of Authors (Hindi) अक्षय कुमार देराश्री , मनोहर सिंह राठौड़
Edition 1st
Book Type Paper Back
Pages 115

“गीत” ग्राम्य जीवन का सुस्पष्ट शाब्दिक चित्रण है। गीत गेय होने से मौखिक रूप से ग्रहण होकर स्मृति पटल पर स्थायी होते हुए सभी प्रकार के स्त्री-पुरुषों के तल को स्पर्श कर प्रभावित करते हैं। हालांकि इन गीतों की कोई निश्चित रचना तिथि नहीं होती। फिर भी ये मौखिक परम्परा से पीढ़ी-दर-पीढ़ी-चले आते हैं परंतु मौलिक रचना के रूप में समयानुसार परिवर्तन भी होता रहा है विशेषतया नये नाम जुड़ते जाते हैं। निःसंदेह गीत हृदय का स्पन्दन और आम जनता की भाषा है जिसमें मेवाड़ की संस्कृति, रीति-रिवाज व संगीतमय इतिहास परिलक्षित होता है। परम्पराओं से सरोबार गीत सदैव अक्षुण्ण रहते हैं। यदि हम इन्हें आंचलिक संस्कृति की पाठशाला कह दे तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। गीत मुख्यतया महिलाओं के कोकिल कंठ से निसृत हुए हैं। वे ही इन गीतों की जननी होती है। यदि देखा जाय तो गीतों का प्रतिपादन विषय ही परिवार होता है, अतएव परिवार से संबंधित प्रत्येक घटना अथवा संबंधों को जब गीतों में संजोया जाता है तो उसकी ऐतिहासिकता पर तनिक भी संदेह नहीं किया जा सकता है। गीतों में उस प्रदेश विशेष की शाश्वत संस्कृति की छवि सुस्पष्ट सुनने व देखने को मिलती है।

“मंगल गीत मालिका” इसमें अपवाद नहीं है। यह मेवाड़ में गाये जाने वाले गीतों का झुरमुट है किन्तु ये समग्र मेवाड़ की परम्पराओं, रीति-रिवाजों, पारिवारिक संबंधों, पारस्परिक सौहार्द, अंतःस्थल में छिपी संस्कृति को उद्घाटित करते हैं। पंडित रविशंकर देराश्री बेरीस्टर के साथ ही एक विद्वान इतिहासकार भी थे। आपकी धर्मपत्नी श्रीमती माधुरी जी विविध अवसरो पर विशेषतया वैवाहिक गीत मेवाड़ी भाषा में लयबद्ध गाती थी, जिनसे कई ऐतिहासिक तथ्य उभरकर सामने आते थे जिन्हें विचार कर पं. देराश्री सा. ने एक अबोध बालिका से इन्हें लिखवाने का यत्न किया जिसमें यत्र-तत्र लिखावट की गलतियां रह गई उसे ठीक कर आपने सुविशाल ऐतिहासक सामग्री के भंडारण में सुरक्षित कर दिया। गीतों की गायिका श्रीमती माधुरी जी के सुपुत्र अक्षय कुमार जी देराश्री (रिटा. कमीश्श्रर) ने इसका अनुवाद करवा के संपादन कर प्रकाशित कराने का श्रम किया एतर्थ साधुवाद। “मंगल गीत मालिका” नवीन पीढ़ी के लिए मील का पत्थर होगी। वर्तमान में वैवाहिक अवसरों पर डी.जे. संस्कृति के कोलाहल में इस प्रकार के हृदयस्पर्शी गीत भले ही छिप गये। इस पुस्तक को पढ़कर पाठकों की रिज्ञासा बढ़ेगी। ऐसी आशा है कि जनसाधारण में पुस्तक में दिये गये गीतों को गाये जाने की अमूल्य सांस्कृतिक विरासत पुनर्जीवित होगी तथा घर-घर में यही गीत गाये जायेंगे। अतएव “मंगल गीत मालिका” पठनीय, संग्रहणीय, श्रवणीय अनुपम मालिका साबित होगी।

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