“विश्वकोष की व्युत्पति हो या कल्याण का आध्यात्मिक लेख, कोंटीनम की अंग्रेजी कविता हो या ई बी का आर्टिकल या कल्पतरु का राईट अप, तीसरा नेत्र का छन्द हो या मृदुला का गीत, खण्डकाव्य हो या शाही गजल, डा.पण्डया की रचनाओं में यथार्थ का उत्स तो भावों की भागीरथी बहती नजर आती है|
तिरुत्तरा, तिसरानेत्र, आनन्द-दीप, मृदुला, दर्पण, निबन्धिका, संशिरा आदि आपकी चर्चित कृतिया हैं|’आसव’ आपके हाथ में है|
कसौटी, आदर्शनारी, तिसरानेत्र, परिचय, मेरा प्यारा भारत ऐसा, दिव्य पुरुष, पुनद्रष्टि और मृदुला आदि खण्डकाव्य हैं|
संवेदनशीलता सृजन का गर्भ है, यह व्यक्ति को व्यक्तित्व बना देता है| कवी, चिंतक,लेखन के साथ-साथ संस्कृति तथा समाजसेवी के विविध रूपों में इसी शिला ने डा.पण्डया को बिम्बित कर सहस्त्राब्दी के सफरनामे में दर्ज किया है|
बीसवीं सदी की सांझ ने डा.पण्डया को इंदिरा प्रियदर्शिनी,राष्ट्रीय एकता, विजयरत्न, भारत उत्कृष्टता आदि राष्ट्रीय पुरस्कारों एवं स्वर्णपदक सहित कई पुरस्कारों की माला पहनाई तो नई शताब्दी की सुप्रभात ने मेन ऑफ़ अचिव्हमेंट (2000), भारतमाता अवार्ड (2001), नियो सेंचुरी अवार्ड (2001)”

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